एक शाम बचपन के नाम

सुन्दर, सरल बचपन. बेडमिन्टन खेलते बच्चों को देखते मुझे मेरा बचपन याद आ गया की किस तरह मैं भी कैसे अपनी छोटी बहिन के साथ ऐसे ही सड़क पर बेडमिन्टन खेलती थी. और आज में अपनी बेटी के साथ इन दोनों बच्चों को खलेते देख रही हूँ. कहाँ गया समय ? मेरी उनुपस्थिती में घर के सामने बच्चों का पार्क बना है. बहुत अच्छा लगा देख कर की चलिए किसी ने बच्चों के बारे में सोचा तो वरना ज़मीन पर एक स्कूल की और एक बिल्डर की नज़र थी जो ऊँची इमारतें खड़ी करने वाला था. मैं इस पोस्ट के द्वारा उन सभी महानुभावों को धन्यवाद् देती हूँ की जिन्होंने पार्क बनाने का बीड़ा उठाया.
मैं आपको थोडा इस पार्क से बनने से पहले ज़मीन का इतिहास बताना चाहूंगी. इतिहास से मेरा मतलब २० साल.

  • १९८५ – हमारा घर बनकर तैयार हो गया और हम अपने २५ साल पुराने क्वार्टर छोड़ कर अपने घर में रहने आये. तब हमारे घर के सामने नाला और उजड़ा घडा था. मेरे अम्मा बाबा गया रखते थे और उन्हें नए घर में कोई जगह समझ नहीं आ रही थी की गया कहा रखे. और फिर क्वाटर में गया इतने अच्छे से नहीं रह पाती थी. उन्होंने सामने वाले घडे की सफाई की, अपने और गया लायक जगह घेर कर उस में बगीचे बनाया. लोगबाग कहते थे मेरे बाबा को की आप ज़मीन हटपने का इंतजाम कर रहे हैं. बाबा कहते थे मुझे कोई डर नहीं और न चिंता है, जिसकी ज़मीन है वो अभी आ कर ले जाए. लेकिन जब तक है में उससे हरा भरा कर दूँ और अपने गया को आराम से रख लूँ. बाबा ने उसमे कई पेड़ लगाये, और उस वीराने को हराभरा कर दिया.
  • १९९५ – बाबा गुजर गए, गया बेच दी गयी. सामने वाली ज़मीन में निर्माण कार्य शुरू हो गया. सारे पेड़ कट गए. बगीचे के एक तरफ घर बनने शुरू हुए और दूसरी तरह घडा ज्यादा था तो उस भरने के लिए कचरा डाला गया. मैं आपको बता नहीं सकती की वो २ साल हमने कैसे बिताये. इतना गन्दा कचरा, और उस कचरे की अथाह बदबू. गर्मियों में तो ऐसा लगता था की हम नरक में है. वो तो भगवान् ने भला किया की कोई बिमारी नहीं फैली वरना सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी बिमारी/महामारी फेलाने में. 
  • १९९९-२००० – अंततः घडा भर गया और मैदान बन गया लेकिन उस पर क्या बने ये विवाद शुरू हो गया. 
  • २००७ – ये तय हुआ की की मैदान किसी बिल्डर को नहीं दिया जायेगा. 
  • २०१० – आज यहाँ बाल उद्यान है और दूर दूर से बच्चे यहाँ खेलने आते हैं और हर तबके के. देख के मन प्रसन्न होता है की हमने जो कष्ट झेला वो बेकार नहीं हुआ. 
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11 thoughts on “एक शाम बचपन के नाम

  1. अजय कुमार झा

    आपकी शैली दिलचस्प है और फ़लैश बैक तो शायद पहली बार देखा है इस तरह से प्रस्तुत होते हुए । बहुत बहुत शुभकामनाएं लिखती रहिए

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  2. कुश

    मैंने भी मेमोरी में रिवर्स गियर लगा लिया… फोटोस अच्छी है..

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  3. शरद कोकास

    मुझे मेरी एक कविता याद आ गई " क्या ज़रूरी है फूलों से रंगत की और बच्चों से बागीचे की ज़रूरत पूछी जाये …"

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  4. उन्मुक्त

    बचपन के दिन भी क्या दिन थे।

    सच पार्क बना कर अच्छा काम किया।
    सासू मां का शॉल पूरा हो गया?

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    1. Richa Post author

      धन्यवाद उन्मुक्तजी.
      हाँ सासू माँ का शाल पूरा हो गया 🙂

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