मेरी अमेरिका यात्रा – सबसे पहले बात शिशुओं की

मैंने अपनी पहली पोस्ट में कहा था की मैंने अपनी अमेरिका यात्रा में जो कुछ सीखा वो सब कुछ में आप सब से बाटूंगी। तो उसी श्रंखला में सबसे पहली पोस्ट शिशुओं के ऊपर है। अमेरिका मे जिस तरह से शिशुओं की देखभाल की जाती है, उनका ध्यान रखा जाता है, और सबसे बड़ी बात उनका आदर किया जाता है वो गौरतलब है। शिशुओं का ही नहीं शिशुओं की माओं का भी बहुत ध्यान रखा जाता ही। शिशुओं की ऐसी देखभाल मैंने भारत में नहीं देखी। इस बात पर पूरा यकीन तब हुआ जब मैंने रेवा के साथ भारत में कदम रखा। अन्तराष्ट्रीय हवाई यात्रा में सबसे पहले उन परिवारों को विमान मे अनुमति दी जाती है जिनके साथ शिशु या छोटे बच्चे हों परन्तु भारत में जब मुझे दिल्ली के अंतर्राज्यीय हवाई अड्डे में विमान लेते समय ऐसी कोई सुविधा नहीं मिली। चलिए वो बात पर मैंने गौर नहीं फरमाया लेकिन लोगों मे इतनी भी तमीज नहीं थी की शिशु के साथ महिला है तो उस रास्ता दें, उल्टा मुझे उन्हें रास्ता देना पड़ रहा था जाने के लिए जैसे उनके बैठते ही विमान चल पड़ेगा।
जितनी हमें तकलीफ होती है विमान में बदलते हवा दबाव से उससे ज्यादा तकलीफ होती है बच्चों को और उससे वो बहुत रोते हैं। बच्चा अगर रोयेगा फिर भी चुप भी होगा। एक बात और बता दूँ की जितनी तकलीफ बच्चे को होती है उससे ज्यादा दिल माँ का रोता है जब बच्चा रोता है तो कृपया उससे घुर कर या उससे देख फुसफुसाए नहीं। थोड़ा धीरज रखिये, उसकी माँ उससे चुप करा रही है।

सबसे अच्छी बात मुझे अमेरिका की लगी की वहां अनजाने और परिवार के बाहर के लोग बच्चे को हाथ नहीं लगाते और लगाते भी हैं तो हाथ धो कर या hand sanitizer इस्तमाल कर के। बिना माता-पिता की आज्ञा से उससे गोदी में नहीं उठाएंगे, और उसके सिर्फ पैर ही छुएंगे – गाल और हाथ भी नहीं। उसक सामने आ कर जोर से नहीं बोलेंगे। अगर वो सो रहा है तो उससे कमरे में नहीं जायेंगे। लेकिन ये सब बातें यहाँ अनजानी है।
रेवा से मिलने कितने लोग आते हैं, आते ही अपन गंदे हाथों से उस उठाते हैं, उसके सामने जोर जोर से बोलकर खिलाते हैं, बेचारी आधे घंटे तक आंसुओं से रोती है। मुझे समझ नहीं आता की उससे जोर जोर कर बोलकर खिलने से क्या मिलेगा। इससे वो आपको पहचानेगी नहीं बल्कि आपकी आवाज सुनकर इतना डर जाती है। एक परिवार ने तो हद करदी, जब वो मिलने आये तो रेवा सो रही थी, बोलते अरे उससे उठाओ ज़रा देख तो लें अंग्रेजन कैसी है !!!

आप सभी से मेरा और एक माँ का अनुरोध है की शिशुओं के प्रति थोड़ा सावधानी बरतिए। कुछ बातें गाँठ बाँध लीजिये –

  • शिशु को बिना हाथ धोये न लें।
  • कभी उसके गाल पर न पुचकारें, न उसके हाथ पकड़े। बच्चे बहुत कोमल होते हैं और आपके द्वारा दिए गए कीटाणु उनके मुंह में जायेंगे। सिर्फ उनके पैर छुए।
  • शिशु के सामने हमेशा आहिस्ता से बोले। आपकी तेज़ आवाज से बच्चे डर सकते हैं। अगर आप किसी शिशु से मिलने जा रहे हैं तो उससे सीधे नज़र न मिलाये। पहले उसके हावभाव देखिये की वो आपको किस तरह मिल रहा है।
  • शिशु की नींद सबस ज़रूरी है, उसकी नींद आदर करे और उसमें कभी दखल न दे।
  • सबसे ज़रूरी बात, पहले माँ/पिता से आज्ञा लें।

आशा करती हूँ की आप इन सभी बातों का ध्यान रखेंगे और अपनी उपस्थिति से शिशु या उसकी माँ की परेशानी का कारन न बनकर बल्कि उनका आनंद और बठाये।

Advertisements

4 thoughts on “मेरी अमेरिका यात्रा – सबसे पहले बात शिशुओं की

  1. somendra

    रेवा जी का आने वाला समय खुशियों से भरा पूरा हो. रिचा जी मेरी बेटी भी बाहर ही जन्मी है. आपकी भावनाओं को बहुत अच्छे से समझ सकता हूँ.

    Reply
  2. M VERMA

    1. आपके ब्लाग का कलेवर अच्छा लगा.2. शिशुओं के प्रति आपकी सलाह सुन्दर है. हमें सावधानी रखनी चाहिये.3. सीख जहाँ से मिले ले लेनी चाहिये.

    Reply
  3. Neeraj Rohilla

    दिल को छू लेने वाली पोस्ट…पश्चिम से कभी ढंग की चीजें उधार लेकर अपने समाज को सुधार पाते तो कितना अच्छा होता । आपने बच्चों की बात की तो कुछ बातें और कह देते हैं।यहाँ अमेरिका में कम से कम ५ साल तक के बच्चे कार की पिछली सीट पर ही बैठते हैं, बच्चों वाली सीट में, सुरक्षा की दृष्टि से ये बहुत जरूरी है। भारत में अपने ही रिश्तेदार को खुद बिना सीट बेल्ट लगाये और अपनी ही गोद में अपने ४ साल के बच्चे को बैठाकर नोएडा के खतरनाक टैफ़िक में कार चलाते देखा तो मन दुखी हो गया। उनको समझाया तो बोले मैं बढिया ड्राईवर हूं आज तक कोई एक्सीडेंट नहीं हुआ। सीट बेल्ट न लगाने और बच्चे को अलग सीट पर न बैठाने पर जब मैने वापिस आटो से जाने की धमकी दी, तो उन्होने अनमने से होकर मेरी बात मानी। और उस दिन के बाद से सम्बन्धों में वो बात नहीं रही।बच्चे तो नासमझ हैं, लेकिन बडे उनका ख्याल करना कब शुरु करेंगे?

    Reply
  4. Richa

    धन्यवाद सोमेंद्रजी, वेर्माजी और रोहित जी. रोहितजी आपने एक दम सही बात कही, भारत में सीट बेल्ट और हेलमेट लगाना जैसे पाप है. दिल देहलाना वाला द्रश्य है मोटर-साईकल की टंकी पर बच्चों को बैठाकर या स्कूटर पर आगे २ बच्चों को खड़ा करके चलाना…

    Reply

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s