हाय मेरी नींद !

रेवा को हलकी सर्दी हो गयी है, वैसे सब कुछ ठीक है लेकिन उससे दूध पीना अच्छा नहीं लगता। बहुत रोती है दूध पीने में। २ घंटे के रोने धोने के बाद अब जा कर सोयी है पर अभी भी नींद अच्छे से नहीं आई है उससे। बीच बीच में जा कर फिर सुलाना पड़ता है। सोती भी बस गोदी में है और वो भी खड़े रहो उसे गोदी में ले कर, जहाँ बैठे वैसे ही उसका मचलना शुरु। पता नहीं बच्चों को कैसे पता चलता है की वो गोदी में है की नहीं, और गोदी में ले कर उन्हें खड़े है की नहीं। मेरी दिनचर्या इतनी व्यस्त हो गयी है की दिन ढलते ढलते बहुत थकान हो जाती है और फिर उसपर हलकी ठण्ड में धुप निकल आये तो बस –

नींद ऐसे आँखों में भरती है की पूछिए मत…. आजकल मुझे नींद से बहुत प्यार हो गया। मैंने ज़िन्दगी में इतना नींद को मिस नहीं किया जितना अब कर रही हूँ। हाय मेरी नींद !!

इस गुलाबी ठण्ड में फूलों की अलग ही रौनक होती है। फूलों को देख कर मन ताज़ा हो जाता है, ऐसे ही कुछ फूल मेरे घर के बहार खिले हैं –
सोचती हूँ एक कप चाय बनाके पी लूँ इससे पहले की मेरी नन्ही जग जाए…

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5 thoughts on “हाय मेरी नींद !

  1. Udan Tashtari

    चाय पिजिये..क्यूँ नहीं..यहाँ तो बरफ में सब फूल अर्सा बीते, दिखे ही नहीं.बच्चे भी तभी तक जिद करते हैं, जब तक पूरी हो..थोड़ा दिल कड़ा कर थोड़ी देर रोने दें, लेटे लेटे सो जायेगी. जरा रोना भी अच्छी कसरत है बच्चों की. 🙂

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