Monthly Archives: January 2010

बीत गया साल का पहला महिना

पहले तो आप सभी को ६०वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। क्या आपने नया “मिले सुर मेरा तुम्हारा” देखा ? पहले मैंने सोचा था की अपने ब्लॉग पर विडियो डालूंगी लेकिन मन नहीं किया। मुझे पता नहीं क्यों इस नए विडियो में कुछ भी ख़ास नहीं लगा बस संगीत का अंदाज़ नया है लेकिन कोई भावनाएं नहीं है। विडियो में सिर्फ गायक, कलाकार, संगीतकार ही हैं और कोई हस्ती नहीं ना, मज़ा नहीं आया।

अच्छा एक बात बताइए – हमारी सेना के अस्त्र-शास्त्रों के नाम हिन्दू धर्म से ही क्यों लिए गए हैं ? क्या सेना में धर्मनिरपेक्षता नहीं है ?? मुझे सही करिए अगर में गलत हूँ तो

मैंने अपना क्रोचिये के प्रोजेक्ट खत्म किये।


कभी कभी बची-खुची ऊन भी कमाल के रंग दिखाती है –


अब मुझे अपना अफ्घान पूरा करना है जिसके फोटो मैंने प्रकाशित किये थे।
आप सभी का दिन मंगलमय हो!

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जल संचयन के प्राचीन और प्रभावित तरीके

अनुपम मिश्रा एक पर्यावरण कार्यकर्ता हैं। उन्होंने TEDIndia के मंच पर इतने अच्छे से प्राचीन जल संचारण की बात कही। उन्होंने अपनी वार्ता में उनसभी जल संचार के प्राचीन तरीकों की चर्चा की जो सदियों से भारत के रेगिस्तानी इलाकों में उपयोग में आज भी हैं और हरसाल की गर्मी में भी कितने गाँव का फलन पोषण कर रहे हैं। किस तरह हर साल की गर्मी में सरकार के महंगे महंगे जल संचार के mega projects खिल्ली उड़ाते हैं। ज़रूर सुने उनकी ये बहुमूल्य वार्ता –

रेवा का अन्न प्रासन

रेवा का अन्न-प्रासन २-३ दिन पहले हो गया। शुरुआत ओट-मील और सेब जूस से हुई है। ओट-मील से ज्यादा उसे जूस बहुत अच्छा लगा है, चटकारे मारकर पीती है :))

एक हफ्ते तक हमें थोड़ा ध्यान देना होगा जिससे उसे constipation न हो। अगर सब ठीक रहा फिर खुराक बढाई जायेगी। रेवा की डॉक्टर ने हमें बताया की बच्चों का पोषण ९ महीने तक सिर्फ ढूध से ही होता है, ठोस आहार देने से उनके शरीर में enzymes बनते हैं। जल्दी आहार शुरू करने से उनके शरीर में जरूरी enzymes तैयार रहते हैं।
रेवा अब किलकारी मारकर हँसने लगी है, खूब हाथ-पैर मारती है। उसके पैरों से खेलो तो उससे खूब अच्छा लगता है। मालिश की प्रेमी है, अपनी अम्मा से खूब अच्छे से मालिश कराती है।

मेरा समय कहाँ चला जाता है पता ही नहीं चलता। आजकल मम्मीजी के लिए थाल-पोश बना रही हूँ और बाकी समय रेवा के साथ चला जाता है।


ठण्ड और बारिश खूब हो रही है। कह सकते हैं – Life is good !!
आप सभी को बसंत पंचमी की शुभ-कामनाएं।

आप क्या करना चाहेंगे अपने आखिरी २५ साल में ??

मैंने अपने पापा से फ़ोन पर कहा, ” आप यहाँ आइये और घूमिये California, बड़ा सुन्दर प्रदेश है। आपको अच्छा लगेगा।” पापा कहते हैं, “अब हमारी उम्र घुमने की नहीं पूजा पाठ की है। तुम बच्चों के साथ समय कट जायेगा और क्या चाहिए।”
यह सोचना सिर्फ मेरे माता-पिता का ही नहीं बल्कि हमारे समाज के ज़्यादातर सेवानिर्वत वर्ग का होगा। माना मनुष्य के जीवन को ४ भागों में विभाजित किया गया है और ४था पड़ाव संन्यास है। लेकिन मुझे कभी ४था पड़ाव सही नहीं लगा। २५-३० साल की नौकरी के बाद क्या जीवन में सिर्फ पूजा पाठ ही बचता है। जहाँ देखिये वहां सेवानिर्व्रत वर्ग में पूजा पाठ की या फिर गुरु बनाने की होड़ लगी होती है। में नास्तिक नहीं हूँ, लेकिन मुझे लगता है की ये नजरिया एक social symbol बन गया है। आपने किसी सेवानिर्व्रत या वृद्ध दंपत्ति को देखा है की वो भारत ब्राम्हण पर निकले हो ( मैं चार-धाम की यात्रा की बात नहीं कर रही) – कहीं वादियों में हाथ में हाथ डाले, अपने ज़माने के पुराने गीत गुन-गुनते हुए या समुद्र के किनारे बैठे हुए अपने प्रिय लेखक की किताब पढ़ते हुए?
२५-३० साल की ज़धोज़हेद के बाद, इतनी भागादौड़ी के बाद क्या हम वापस से ज़िन्दगी शुरू नहीं कर सकते ? पूजा पाठ के साथ साथ हम अपने मनपसंद किताबें पढ़े, संगीत सुने, नयी नयी जगह घूमें, वो सब करने की कोशिश करे जो जीवन की भागदौड़ में हमसे कहीं छूट गयी थी।

Cookies, Book

मैंने पहली बार अखरोट के बिस्किट बनाये, उम्मीद से काफी अच्छे बने 🙂 इसकी रेसिपी मुझे Martha Stewart की वेबसाइट से मिली। उसमें मैंने अपनी तरफ से थोडा बदलाव किया क्यूंकि मेरे सास-ससुर अंडा नहीं खाते। सब को बहुत पसंद आये।


मैंने Crochet किताब Amzaon पर आर्डर की थी, कल वो भी आ गयी। 200 Crochet blocks
वाह वाह !! बस कब मेरा अफ्घान बने और कब मैं किताब मैं दिए गए pattern बनाऊ।

Made in India, Made in China, Made in Pakistan

विशाल को अपने पापा के लिए कुछ न कुछ यहाँ से लेना था, उनका मन था की पापा जी के पास कोई अमेरिकां की निशानी ज़रूर हो। वैसे पापा जी का भी मन था की अब इतनी दूर यहाँ आये हैं तो कुछ न कुछ ज़रूर ले। ये तय हुआ की पापाजी जैकेट लेंगे। विशाल उन्हें १-२ माल ले गए, कई स्टोर दिखाए पर पापाजी को कुछ पसंद ही नहीं आता था। हम लोगों को समझ ही नहीं आ रहा की इतनी वैराईटी होने के बाद भी पापा जी को कुछ पसंद क्यों नहीं आ रहा। विशाल उन्हें फिर स्टोर ले गए जो घर से थोड़ा दुरी पर था, लेकिन उन्होंने तय किया इसबार वो पापा जी के साथ ही चोइस करवाएंगे। हमसब को प्लान ठीक लगा। २-३ घंटे बाद जब पापाजी और विशाल वापस आये तो फिर भी खाली हाथ। हम फिर चौंक गए।
विशाल ने बताया की पापा जी को क्यों नहीं कुछ पसंद आ रहा अमेरिका का, पापाजी कोई भी जैकेट उठाते तो सबसे पहले ये देखते की वो कहा का बना है। Made in India, Made in China या Made in Pakistan ???
अमेरिका में ९०% वस्तुएं Made in China होती हैं, फिर १०% दुसरे देशों की। भारत और पाकिस्तान की वस्तुएं लगभग बराबर हैं। और हम भूल गए थे की पापाजी सेवानिर्व्रत भारतीय वायु सेना की अफसर हैं। हमारे लिए भले ही ये बातें इतनी मायनें न रखती हो लेकिन एक सेना के अफसर के लिए ये कोई मामूली बात नहीं है। सरहदी गर्मी एक सेना अफसर से ज्यादा कौन अच्छे से जान सकता है। पापा जी को बिलकुल भी कबूल नहीं था की वो उनदोनो में से किसी भी देश की वस्तुएं पहने। और उन्हें उतना आश्चर्य भी था की अमेरिकी मार्केट में इस कदर China छाया हुआ है। वो कर भी क्या सकते थे फिर अंत में उन्होंने बिना लेबेल की जैकेट ली 🙂