शिक्षा और जल कि समस्या

पिछले हफ्ते कि २ मुख्य खबरों ने मुझे इनके बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया, वो हैं –

अनिवार्य शिक्षा विधेयक
आज़ादी के ६२ सालों के बाद उठे इस कदम को मैं कहूँगी – देर आयद दुरस्त आयद! भारतीय संसद ने ६-१४ साल के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के लिए विधेयक पारित कर दिया है। मेरे चाचाजी सरकार द्वारा चालित आदिवासी स्कूल के हेडमास्टर हैं। वो मुझे बताते थे की कैसे उन्हें मशक्कत करनी पड़ती है बच्चों को स्कूल में बुलाने के लिए। माता पिता बच्चों को घर पर बिठा लेंगे लेकिन स्कूल नहीं भेजेंगे, क्यूंकि उनके पास महीने का घर का खर्चा चलने के लिए १०/- नहीं हैं तो बच्चे को कैसे स्कूल भेजें । और अगर कोई १-२ बच्चे आ भी गए एक दिन क्लास में तो दुसरे दिन गायब। चाचा बताते हैं की गरीबी इतनी है की उन्हें ज़बरदस्ती करने में भी शर्म आती है। कोई अगर होनहार बच्चा है तो उसकी फीस चाचा ही भर देते थे। कुछ ऐसे भी माता पिता हैं की जिन्हें समझ ही नहीं मालूम की उनका बच्चा पढ़ कर क्या करेगा।
इस विधेयेक ने ज़रूर उन माता पिता की फीस की चिंता तो ज़रूर ख़तम कर दी है जो चाह कर भी अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज पा रहे थे। पर हमेशा की तरह सरकार के लिए हमारे सवाल खड़े हैं –

  • सिर्फ़ १४ साल तक ही क्यों मुफ्त शिक्षा ? अगर उसे बढ़ाकर १६ कर देते तो बचचों को १०वी तो पुरी हो जाती।
  • सिर्फ़ शिक्षा मुफ्त कर देने से हमारी जिम्मेदारियां खत्म हो जाती हैं ? कौन भेजेगा स्कूल जहाँ दीवारें भी सधी खड़ी नहीं है, बैठने और लिखने के लिए कुर्सी टेबल तो छोडिये एक दरी भी नहीं है, शौचालय नहीं……
  • पर्याप्त शिक्षक लाने के लिए क्या योजना है ? अब जहाँ १ शिक्षक के नीचे कहीं कहीं राज्य में १०० बच्चे हैं तो अब क्या २०० होंगे ??

ऐसे कई सवालों ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया की शिक्षा स्तर पर हम जहाँ थे क्या अब भी वहीँ रहेंगे ?

भारत में सूखे का प्रकोप
इस साल बारिश ने फिर निराश कर दिया और अब धीरे धीरे हमें अनचाही खबरें सुनाई दे रही हैं। आने वाले समय में होने वाली पानी कि कमी। फसल का बुरी तरह से प्रभावित होना। कई राज्य सुखा ग्रस्त घोषित हो गए हैं।
पर इस जल-संकट का कारण सिर्फ़ बारिश है ?? हम इस बार मानसून और सरकार पर दोष देकर इस समस्या से पल्ला नहीं झाड़ सकते। सही मानिये हमने अपने जल स्त्रोतों का कभी आदर ही नहीं किया। शहरों में तो बुरा हाल है, जहाँ चाहा जैसे चाहा पानी खर्च किया। जब तक नल आ रहे हैं पानी खर्च करो, बस चले तो पुरा घर धो डालो। हमारी आँखें तभी खुलेंगी जब हमें पानी कि हर बूँद का मोल देना पड़ेगा। और ऐसा कुछ हिसाब कृषि का है । विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले 30 साल में ऐसी फ़सलों की खेती अधिक हो रही है, जिन्हें पानी की अधिक आवश्यकता होती है। पहले पंजाब में धान की खेती नहीं होती थी क्योंकि वहाँ प्राकृतिक रूप से धान के लिए पानी नहीं था। धान के लिए बिहार, बंगाल और उड़ीसा जैसे इलाक़े थे, लेकिन इसके बावजूद किसानों ने धान की खेती की जिसका अब नुक़सान हो रहा है।
हमें जागना होगा, हमें जल का आदर करना सीखना ही होगा। हम कब एहसास करेंगे कि पानी कि एक एक बूंद अनमोल है। देश में सबसे कम बारिश रेगिस्तानी इलाक़े जैसलमेर में होती है। इस साल वहाँ अब तक सिर्फ़ तीन सेंटीमीटर बारिश हुई है लेकिन फिर भी वहाँ तालाब लबालब भरे हुए हैं। जैसलमेर जैसे रेगिस्तानी शहर जब कम पानी के साथ फल-फूल सकते हैं तो भारत के अन्य शहर ऐसा क्यों नहीं कर सकते।

जल कि बात करके मुझे Indian Ocean के इस मधुर गीत ‘माँ रेवा’ कि याद आगई जिसमें नर्मदाजी का आवाहन किया गया है –

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