क्रोचिया और ग़ज़ल

आजकल मैं क्रोचिये से अपना समय काट रही हूँ, और सही मानिये मेरा दिल आ गया है। हालाँकि मैंने उतना कुछ बनाया नहीं है लेकिन जितना बनाया है उससे दिल खुश हो गया है और चाहती हूँ इसको और आगे बढाओं। देखिये कितना हो पाता है। आप भी देखिये और बताइए कैसा लगा 🙂

शादी से पहले मैं ग़ज़ल साल में १-२ बार सुनती थी और अब हमारे घर में आप कभी भी सुनेंगे तो आपको या तो ग़ज़ल या फिर कव्वाली सुनाई देगी 🙂 ऐसा कुछ नहीं हुआ मेरे साथ जिसे मुझे इन दोनों शैलियों को सुनने पर मजबूर कर दिया गया है। मेरे शौहर को संगीत का बहुत शौक है और वो ख़ुद भी गाते और बजाते हैं। सबसे अच्छी बात जो मुझे लगी है की उनके साथ मैंने दुनिया की हर शैली के संगीत को सुनने का मौका मिला है – पाश्चातीय, ग़ज़ल, कव्वाली, शास्त्रीय, आदि। लेकिन आजकल हमारे ipod में ग़ज़ल और कव्वाली की संख्या इतनी होगयी है की shuffle on होने पर भी हर दूसरा गाना या तो ग़ज़ल है या कव्वाली। चलिए इस बहाने मेरी उर्दू साफ होगी।

आप भी सुनिए जगजीत कौर की एक खुबसूरत ग़ज़ल, और कव्वाली अगले पोस्ट में।

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5 thoughts on “क्रोचिया और ग़ज़ल

  1. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi

    सुन्दर रचनाएँ हैं। मुझे क्रोशिए से बनी टोपी बहुत पसंद है लेकिन कोई बुनने वाला नहीं मिल रहा है।
    रक्षाबंधन पर शुभकामनाएँ! विश्व-भ्रातृत्व विजयी हो!

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  2. M VERMA

    रचना और कला किसी भी क्षेत्र मे हो अपना प्रभाव छोडती ही है. बहुत खूब

    Reply
  3. उन्मुक्त

    मैंने फ्लिकर पर जा कर आपका क्रोशे का काम देखा। बहुत सुन्दर है। इंटरनेट पर ही इसे बेचने के व्यवसाय क्यों नहीं करतीं। मेरे विचार से बहुत से लोग इसे खरीदन पसन्द करेंगे।

    Reply

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