Cinema – कल आज और कल


मुझे आश्चर्य होता है की हम सिनेमा में कहा जा रहे हैं ? बहुत कम फ़िल्म हैं आजकल जो दर्शकों में अपनी छाप छोड़ रही हैं, और ज्यादातर उस श्रेणी में आती हैं जिन्हें देख कर ऐसा लगता है की डाइरेक्टर के पास सब कुछ उम्दा था – कलाकार, संगीतकार, गीतकार …… लेकिन कहानी तैयार करना भूल गया।
अब जैसे कल ही हम फ़िल्म ‘दिल-कबड्डी’ देख रहे थे और फ़िल्म के विराम तक ये ही समझ नहीं आया की फ़िल्म कहना क्या चाहती है। कोई सयोंजकता नहीं, सबकुछ उलझा सा, इतने मन्झे हुए कलाकार और फ़िल्म के लिए क्या कहें – बकवास ? शायद हाँ। ऐसे ही दूसरी फ़िल्म है युवराज – सुभाष घई निर्मित। मुझे ये बात हमेशा सताती है की आजकल ज्यादातर सारे निर्माता/निर्देशक अपनी फिल्मों की कहानियाँ विदेश में ही क्यों स्थापित करते हैं – क्या पुरे भारत मैं ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ उनकी फ़िल्म बन सके। और फ़िर फ़िल्म देखिये तो सब कुछ व्यर्थ, ऐसा लगता है की फ़िल्म की कहानी से ज़्यादा ज़रूरी है की फ़िल्म कहाँ शूट हो रही है। फ़िल्म में कहानी और पठकथा की कमी को आजकल बड़े-बड़े निर्देशक भी इन आकर्शिन्य स्थलों से छुपाना चाहते हैं। कहानी की ज्यादातर शुरुआत रईस घरानों से होती है जैसे हमारे देश में सब रईस ही हैं और रईस भी कोई ऐसा वैसा नहीं – एक महल जैसा घर होगा, जिसमें हजारों नौकर-चाकर, महंगी कार और सबसे ज़्यादा ध्यान देने वाली बात है उनके कपड़े जो कहीं से आम नहीं लगते। अब फ़िल्म ‘युवराज’ में कहानी कुछ इस तरह शुरू होती है, चेकोस्लाविया का शहर परागुए – उसमें ये कहानी फिल्माई गई है। हीरो और हिरोइन संगीत प्रेमी है – आप जानते ही हैं की हमारी फिल्मों में किस तरह से कला दिखाई जाती है – एक दम बनावटी। हिरोइन violin बजाती है और हीरो गाने गता है। हिरोइन बहुत बड़े डॉक्टर की लड़की है जो महल जैसे घर में रहती है और हीरो को उसके रईस पिता ने घर से निकाल दिया है। अब वो एक किराये के घर में रहता है और टूटी-फूटी कार चलता है। शायद कार का टूटी-फूटी होना ही वास्तविक था बाकी सब कुछ अवास्तविकता की चरम सीमा पर था – महल जैसे घर से ले कर हिरोइन के violin बजाने तक। फ़िल्म शुरू होने के ३०-४५ मिनट में ही मैंने फ़िल्म बंद कर दी क्यूंकि मुझे कहीं से मनोरंजक नहीं लगी। एक तरह से संसाधन की बर्बादी। मैं ख़ुद को फ़िल्म से नहीं जोड़ पा रही थी, सब मिथ्या लग रहा था।

कल ही शाम, मैं और विशाल साईं परांजपे की फ़िल्म चश्मेबदूर देख रहे थे और आज भी उस फ़िल्म में ऐसा कोई द्रश्य नहीं था जिसमें हमें आनंद न आया हो। कहानी देखिये, अदाकारी देखिये, और सराहनीय बात ये है की फ़िल्म २८ साल पुरानी हो कर भी उतनी ही मनोरंजक है। किस तरह से कहानी की पठकथा तैयार की और किस तरह से हमें पेश किया गया – मोटरसाईकिल से लल्लन मियां की दुकान तक।

लगता है की समय के साथ हमने सिनेमा में इस्तमाल होने वाली महंगी और आधुनिक तकनीक तो खरीद ली है लेकिन पठकथा क्या होती है – भूल गए हैं। क्या १००-२०० रुपये की टिकिट ले कर आप ऐसी फ़िल्म देखना चाहेंगे ?

पर मैं पूरी तरह से निंदा भी नहीं कर सकती क्यूंकि कुछ अच्छी फ़िल्म भी बन रही हैं, जैसे – Rock on!!, A Wednesday, Welcome to Sajjanpur…..
आप मुझे बताइए अपने विचार आज-कल की फिल्मों के बारे में और अपनी पसंदीदा फ़िल्म – नई और पुरानी।

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7 thoughts on “Cinema – कल आज और कल

  1. Pradnya

    My fav movies are:or I should say the movies I liked when I watched them are-Maine Pyar kiya,HAHK (may not enjoy them now, but they were good then)DDLJ,Dil Chahta HaiAmong the old ones-Golmaal, Khoobsurat, Chupke-Chupke.

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  2. Anonymous

    baaton baaton mein, khataa meetha, abhimaan, mili, deewaarRang de basanti, jo jeeta wohi sikander, rangeela etc etc…Also I like Govinda’s movies..because they are outright funny without any pretense or show off of intellectualism. You know what you are going to get.

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  3. Dr Parveen

    इन फिल्मों के बारे में हमारे विचार आप के विचारों से मिलते हैं।

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  4. weshallsing

    kshama karein, humne galti se anonymous ki tarh apane vichar wayqat kar diye they… baaton baaton mein, khataa meetha, abhimaan, mili, deewaar Rang de basanti, jo jeeta wohi sikander, rangeela etc etc… Also I like Govinda’s movies..because they are outright funny without any pretense or show off of intellectualism. You know what you are going to get.

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  5. roushan

    कुछ नई और कुछ पुरानी हास्य फिल्में जैसे अंगूर, हेराफेरी आदि हमेशा से पसंद हैं वैसे तारे जमीन पर बेहद शानदार फ़िल्म है शायद सबसे अधिक पसंद वही हैब जहाँ तक याद आया

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  6. Vidhu

    प्रिय रिचा जी …अपनी पोस्ट पर तुम्हे देखा .भोपाल मैं कब और कहाँ थी …तुमने सही लिखा है ..झूटी चीजें आदमी को ज्यादा समय तक बाँध कर नही रख सकती…मैं तोनई फिल्म देखने की बजाय डिस्कवरी चेनल देखना पसंद करती हूँ …तुम गोलमाल ,अंगूर, मेरे अपने ,तेरे घर के सामने जैसी ,सेकडों फिल्म हैं जिन्हें आज भी बार-बार देख सकते हो ….और उससे तो बेहतर है हम अपने पसंदीदा ब्लॉग पढ़ें ….

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