Monthly Archives: January 2009

Stanford University – California

मुझे California के Bay Area आए हुए काफी समय हो गया लेकिन कभी मौका ही नहीं हुआ Stanford University जाने का। फिर आज कहीं जाकर मैं और मेरी सहेलियां निकल पड़े University घुमने, तो आज कुछ बातें विश्व के जाने-माने विश्वविद्यालय के बारें –

Leland Stanford Junior University, जिसे Stanford University जाना जाता है । यह एक अशासकीय अनुसंधान विश्वविद्यालय है। विश्वविद्यालय सन् १८८५ में स्थापित हुई थी। इसे स्थापित Governor of California एवं U.S. Senator Leland Stanford और उनकी पत्नी Jane Lathrop Stanford ने अपने बेटे Leland Stanford Jr की याद में बनवाया था जो अपनी १६वां जन्मदिन के कुछ हफ्ते पहले ही typhoid का शिकार हो गया।

विश्वविद्यालय में करीबन हर साल ६,७०० पूर्वस्नातक और ८,००० स्नातक विश्व के हर कोने से भरती होते हैं। करीबन १८ नोबेल पुरस्कारित विश्वविद्यालय से संभंधित हैं। विश्वविद्यलाय के भूतपूर्व छात्रों ने कई तकनिकी कम्पनियां भी स्थापित की हैं जैसे – HP, Sun Microsystems, NVIDIA, Yahoo, Cisco, Silicon Graphics, and Google ।

मैं आपको कुछ ऐतिहासिक चिन्हों के बारे में बताना चाहती हूँ जो विश्वविद्यालय में स्थित हैं:-

१) Hoover Tower: हूवर मीनार २५८ फ़ुट ऊँची है और ये Stanford University के परिसर में खड़ी है। हूवर मीनार हूवर संस्था का भाग है, जो Herbert Hoover का स्थापित किया हुआ शोध संस्थान है। Herbert Hoover अमेरिका के ३१वें राष्ट्रपति थे।

विश्वविद्यालय का द्रश्य Hoover Tower की चोटी से :-


२) Main Quad: यह चतुष्क में विश्वविद्यालय की सबसे प्रथम निर्मित इमारतें हैं जो सन् १८८७-१८९१ में बनी।

३) Stanford Memorial Church:- चर्च विश्वविद्यालय की मध्य में स्थित है। Jane Stanford ने चर्च अपने पति Leland Stanford की याद में बनवाया था।



४) Rodin Sculpture Garden:- Auguste Rodin फ्रांस के जाने माने कलाकार थे जो पत्थर से आकृति बनाते थे। उनकी कुछ मशहूर कलाकृति विश्वविद्यालय में रखी हुई हैं।


The Three Shades


Meditation


Martyr


Fallen Caryatid with Urn


The Gates of Hell


Fragment of “The Walking Man”

Stanford University की कुछ और मनमोहक तस्वीरें :-

अगर आपको विश्वविद्यालय की बारे में और जानकारी चाहिए तो यहां जाइये :
http://www.stanford.edu/home/welcome/

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Cinema – कल आज और कल


मुझे आश्चर्य होता है की हम सिनेमा में कहा जा रहे हैं ? बहुत कम फ़िल्म हैं आजकल जो दर्शकों में अपनी छाप छोड़ रही हैं, और ज्यादातर उस श्रेणी में आती हैं जिन्हें देख कर ऐसा लगता है की डाइरेक्टर के पास सब कुछ उम्दा था – कलाकार, संगीतकार, गीतकार …… लेकिन कहानी तैयार करना भूल गया।
अब जैसे कल ही हम फ़िल्म ‘दिल-कबड्डी’ देख रहे थे और फ़िल्म के विराम तक ये ही समझ नहीं आया की फ़िल्म कहना क्या चाहती है। कोई सयोंजकता नहीं, सबकुछ उलझा सा, इतने मन्झे हुए कलाकार और फ़िल्म के लिए क्या कहें – बकवास ? शायद हाँ। ऐसे ही दूसरी फ़िल्म है युवराज – सुभाष घई निर्मित। मुझे ये बात हमेशा सताती है की आजकल ज्यादातर सारे निर्माता/निर्देशक अपनी फिल्मों की कहानियाँ विदेश में ही क्यों स्थापित करते हैं – क्या पुरे भारत मैं ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ उनकी फ़िल्म बन सके। और फ़िर फ़िल्म देखिये तो सब कुछ व्यर्थ, ऐसा लगता है की फ़िल्म की कहानी से ज़्यादा ज़रूरी है की फ़िल्म कहाँ शूट हो रही है। फ़िल्म में कहानी और पठकथा की कमी को आजकल बड़े-बड़े निर्देशक भी इन आकर्शिन्य स्थलों से छुपाना चाहते हैं। कहानी की ज्यादातर शुरुआत रईस घरानों से होती है जैसे हमारे देश में सब रईस ही हैं और रईस भी कोई ऐसा वैसा नहीं – एक महल जैसा घर होगा, जिसमें हजारों नौकर-चाकर, महंगी कार और सबसे ज़्यादा ध्यान देने वाली बात है उनके कपड़े जो कहीं से आम नहीं लगते। अब फ़िल्म ‘युवराज’ में कहानी कुछ इस तरह शुरू होती है, चेकोस्लाविया का शहर परागुए – उसमें ये कहानी फिल्माई गई है। हीरो और हिरोइन संगीत प्रेमी है – आप जानते ही हैं की हमारी फिल्मों में किस तरह से कला दिखाई जाती है – एक दम बनावटी। हिरोइन violin बजाती है और हीरो गाने गता है। हिरोइन बहुत बड़े डॉक्टर की लड़की है जो महल जैसे घर में रहती है और हीरो को उसके रईस पिता ने घर से निकाल दिया है। अब वो एक किराये के घर में रहता है और टूटी-फूटी कार चलता है। शायद कार का टूटी-फूटी होना ही वास्तविक था बाकी सब कुछ अवास्तविकता की चरम सीमा पर था – महल जैसे घर से ले कर हिरोइन के violin बजाने तक। फ़िल्म शुरू होने के ३०-४५ मिनट में ही मैंने फ़िल्म बंद कर दी क्यूंकि मुझे कहीं से मनोरंजक नहीं लगी। एक तरह से संसाधन की बर्बादी। मैं ख़ुद को फ़िल्म से नहीं जोड़ पा रही थी, सब मिथ्या लग रहा था।

कल ही शाम, मैं और विशाल साईं परांजपे की फ़िल्म चश्मेबदूर देख रहे थे और आज भी उस फ़िल्म में ऐसा कोई द्रश्य नहीं था जिसमें हमें आनंद न आया हो। कहानी देखिये, अदाकारी देखिये, और सराहनीय बात ये है की फ़िल्म २८ साल पुरानी हो कर भी उतनी ही मनोरंजक है। किस तरह से कहानी की पठकथा तैयार की और किस तरह से हमें पेश किया गया – मोटरसाईकिल से लल्लन मियां की दुकान तक।

लगता है की समय के साथ हमने सिनेमा में इस्तमाल होने वाली महंगी और आधुनिक तकनीक तो खरीद ली है लेकिन पठकथा क्या होती है – भूल गए हैं। क्या १००-२०० रुपये की टिकिट ले कर आप ऐसी फ़िल्म देखना चाहेंगे ?

पर मैं पूरी तरह से निंदा भी नहीं कर सकती क्यूंकि कुछ अच्छी फ़िल्म भी बन रही हैं, जैसे – Rock on!!, A Wednesday, Welcome to Sajjanpur…..
आप मुझे बताइए अपने विचार आज-कल की फिल्मों के बारे में और अपनी पसंदीदा फ़िल्म – नई और पुरानी।

Dont Leave Home !

मुझे गाने सुनना बहुत अच्छा लगता है। अब आप पूछेंगे कौनसे गाने, किस तरह के गाने ……
ये सवाल बहुत कठिन है और अब इस सवाल को आसान करने के लिए मैं आपको अपनी पसंद के गाने सुनओंगी और उसके बारे में मेरे ख्याल।
मैंने ये गाना Dido – Dont Leave Home से लिया है। ये गाना मुझे बहुत अच्छा लगता है, पता नही क्यों में इस गाने से अपने आप जुड़ जाती हूँ। जब मैंने पहली बार ये गाना सुना ऐसा लगा की ये गाना मेरे लिए ही लिखा है।
Dido की सुरीली आवाज ने जैसे इसमें जान दाल दी हो। मैंने ऐसी आवाज आजतक नही सुनी- इतनी सुरीली इतनी मधुर। संगीत भी उतना ही सुंदर। आप सुनिए और मुझे ज़रूर बताइए की आपको कैसा लगा। गाने के बोल इस तरह हैं –

Like a ghost don’t need a key
Your best friend I’ve come to be
Please don’t think of getting up for me
You don’t even need to speak
When I’ve been here for just one day
You’ll already miss me if I go away
So close the blinds and shut the door
You won’t need other friends anymore

Oh don’t leave home, oh don’t leave home

If you’re cold I’ll keep you warm
If you’re low just hold on
Cause I will be your safety
Oh don’t leave home

I arrived when you were weak
I’ll make you weaker, like a child
Now all your love you give to me

When your heart is all I need

Oh don’t leave home, oh don’t leave home

If you’re cold I’ll keep you warm
If you’re low just hold on
Cause I will be your safety
Oh don’t leave home

Oh how quiet, quiet the world can be
When it’s just you and little me
Everything is clear and everything is new
So you won’t be leaving will you

If you’re cold I’ll keep you warm
If you’re low just hold on
Cause I will be your safety
Oh don’t leave home.

Oh don’t leave home, oh don’t leave home.

कभी-कभी….

समझ नहीं रहा क्या लिखूं क्यूँ की लिखने के लिए कुछ भी नहीं है। मन कर रहा है लिखने का लेकिन क्या ??
अच्छा में आपको बताती हूँ की आजकल मैं क्या कर रही हूँमैं माँ के लिए शौल बना रही हूँ। देखिये

बस कुछ सिलायाँ और फिर तैयार। आशा करती हूँ की इस हफ्ते तक खत्म हो जाए। मैंने अपनी सासुमाँ के लिएभी एक शौल बनाया था लेकिन उसकी तस्वीर लेना भूल गई, जब भी मौका मिला तो उसकी भी तस्वीर डालूंगी।

फिर मुझे कुछ चित्र बनाने हैं बहुत दिन हो गए रंगों को हाथ लगाये। साथ ही साथ कुछ गमले रखने हैं आँगन में, बहुत मन है पौधें लगाने का। अब सर्दियाँ भी कम हो गई और बसंत भी आने को है। आप लोगों को ज़रूर बतओंगी की मैंने कौनकौन से पौधे लगाये। और सबसे बड़ी बात महीनों से gym नहीं गई, वो भी शुरू करना है। साथ साथ पढाई भी करनी है। करने को बहुत कुछ है, देखिये कितना कर पाती हूँ।

Slumdog Millionaire

आजकल फ़िल्म Slumdog-Millionaire चर्चा मैं है। इस साल फ़िल्म ने कई अवार्ड जीतें हैं। गोल्डन ग्लोब अवार्ड, क्र्टिक अवार्ड और उम्मीद की जा रही है की ऑस्कर मैं भी ये फ़िल्म खूब धूम मचाएगी । ये एक ब्रितानी फ़िल्म है जो मुंबई पृष्ठभूमि पर बनी है । कहानी का आधार विकास स्वरुप की पुस्तक Q and A है। कौन बनेगा करोरपति जैसे कार्यकम के जरिये झुग्गियों में रहने वाले एक युवक के कारोरपति बनने की कहानी की पीछे मुंबई की सबसे बड़े झुग्गियों और बस्तियों की तस्वीर है। मैंने भी ये फ़िल्म देखी और मुझे भी सभी लोगों के तरह बहुत अच्छी लगी। इतने अवार्ड जीतने के बाद हर ख़बर मैं इसी फ़िल्म की चर्चा है। कोई भी चैनल देखिये कहीं न कहीं – कोई न कोई फ़िल्म के बारे मैं कह रहा है।
फ़िल्म को देख कर मेरा मन अभी तक विचिलित है । उन झुग्गियों और बस्तियों को देख कर, वहां गुजर बसर कर रहे लोगों की ज़िन्दगी देख कर मेरा ह्रदय व्याकुल हो गया है। ये भी ज़िन्दगी है ??

धारावी – मुंबई मैं बसा और एशिया का सबसे बड़ा झुग्गी इलाका, कहा जाता है वहां करीब ६० लाख लोग रहते हैं ।

क्या आपको पता है इन झुग्गियों ने मुंबई की सिर्फ़ ६% ज़मीन को घेरा हुआ है लेकिन इनमें मुंबई की करीब ६०% जनसँख्या है। यहाँ पीने का पानी नहीं है, बिजली नहीं है, और कोई भी मूल सुविधाएँ नहीं है। जहाँ नज़र उठाईये गन्दगी और मल के अलावा कुछ नहीं दिखेगा। छोटे छोटे बच्चे कचरा उठाते हुए, गंदे पानी मैं खेलते हुए दिखाई देंगे। क्या ये बच्चे, ये इंसान इस ज़िन्दगी के अधिकारी हैं ? क्या किसी भी को भी इस तरह ज़िन्दगी जीने का अधिकार है ? सुविधायों के अलावा और जो परेशानी है वो हैमाफिया“, यहाँ सिर्फ़ राज है तो माफिया का सरकार नहीं। पर धारावी निवासियों के उत्साह की दात देनी चाइये की जिस उत्साह से अपनी ज़िन्दगी गुजर बसर कर रहे हैं।
मैं जब फ़िल्म देख कर निकल रही तो मेरे अंतर्मन के किसी कोने में शर्म थी और लग रहा था शायद मैं भी किसी तरह से जिम्मेदार हूँ । मुंबई भारत के महानगरों में आता है और एशिया में टोक्यो के बाद। और फिर भी शहर के इतनी बड़ी आबादी झुग्गियों में रह रही है। क्या भारत सरकार को अहसास नहीं या हर बार की भाँती आँखें बंद कर के बैठी है। पुरी दुनिया ने फ़िल्म के ज़रिये हमारे देश की एक अहम समस्या को देखा और माना की इस तरह गुजरबसर करना मानवाधिकारों के खिलाफ है लेकिन हमारी सरकार की ये बात इतनी ज़रूरी नहीं ।
लेकिन क्या ये सिर्फ़ सरकार की जिम्मेदारी है हमारी नहीं ? मैंने मुंबई में करीब १-२ साल बिताएं लेकिन मैंने तो सहायता नहीं की – ये मेरी गलती नहीं ? वहां रह रहे लोगों की जिम्मेदारी नहीं ?
ये सिर्फ़ धारावी में रह रहे लोगों की या सरकार की नहीं बल्कि सभी भारतवासियों की जिम्मेदारी है। सिर्फ़ फ़िल्म देख कर और उसपर अपनी भावनाएं दिखने के अलावा सहयोग भी देना ज़रूरी है।
मैंने निर्णय लिया है की ये मेरी भी जिम्मेदारी है की मैं अपने समाज के उन वर्गों की सहायता करु जिन्हें मदद की ज़रूरत है, क्या आपने निर्णय लिया??

नव वर्ष २००९

नए साल की आप सबको ढेर सारी शुभकामनाएं। आज मेरा मन कुछ कवितायेँ पढ़ने का हुआ । गूगल पर देखा और कुछ महान
लेखकों की कवितायेँ मिली- सुमित्रा नंदन पन्त, महादेवी वर्मा, मैथली शरण गुप्त, हरिवंश राय बचन….
एक कविता मुझे बहुत अछी लगी, महादेवी वर्मा जी की लिखित है । इस कविता में महादेवी जी दीपक से अनुरोध कर रही हैं की वो उनका प्रेम पथ हमेशा आलोकित करता रहे –

मधुत मधुर मेरे दीपक जल !
युग युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल,
प्रियतम का पथ आलोकित कर !

सौरभ फैला विपुल धुप बन,
मृदुल मोम सा धुल रे मृदु तनु;
दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित,
तेरे जीवन का अणु गल गल !
पुलक पुलक मेरे दीपक जल !

सरे शीतल कोमल नूतन,
मांग रहे तुझसे ज्वाला-कण
विश्व-शलभ सिर धुन कहता ‘ मैं
हाय न जल पाया तुझमें मिल ‘ !
सिहर सिहर मेरे दीपक जल !

जलते नभ मैं देख असंख्यक,
स्नेहहीन नित कितने दीपक ;
जलमय सागर सा उर जलता,
विद्युत ले घिरता है बादल !
विहंस विहंस मेरे दीपक जल !

दुम के अंग हरित कोमलतम,
ज्वाल को करते हृदयंगम ;
वसुधा के जड़ अन्तर में भी,
बंदी है तापों की हलचल !
बिखर बिखर मेरे दीपक जल !

मेरे निश्वासों से दुततर,
सुभग न तू भुझने का भय कार ;
मैं अंचल की ओट किए हूँ,
अपनी म्रदु पालकों से चंचल !
सहज सहज मेरे दीपक जल !

सीमा ही लघुता का बंधन,
है अनादी तू मत घडियां गिन;
में द्रग के अक्षय कोशों से-
तुझ में भरती हूँ आंसू जाल !
सजल सजल मेरे दीपक जल !

तब असीम तेरे प्रकाश चिर,
खेलेंगे नव खेल निरंतर;
तम के अनु अनु में विद्युत सा –
अमित चित्र अंकित करता चल !
सरल सरल मेरे दीपक चल !

तू जल जल जितना होता क्षय,
या समीप आता छलनामय;
मधुर मधुर में मिट जाना तू –
उसकी उज्वल स्मित में घुल खिल !
मदिर मदिर मेरे दीपक जल !

प्रियतम का पथ आलोकित कर !!